अनुवाद करना परकाया प्रवेश करना है
अनुवाद केवल शब्दों को एक भाषा से दूसरी भाषा में पहुंचाना नहीं, बल्कि रचनाकार की भावभूमि, संवेदना और संस्कृति को समझने की प्रक्रिया है। सच्चा अनुवाद तभी संभव है, जब अनुवादक मूल रचना में उतरकर उसकी...

अभिव्यक्ति
दिनेश सिंदल,
कवि, लेखक
मित्रों, मुझे एक खेल याद आता है जिसमें एक व्यक्ति दूसरे के कान में कुछ कहता है। दूसरा तीसरे के कान में उसे दोहराता है। तीसरा चौथे के… चौथा पांचवें के… इस तरह वह बात आगे बढ़ती है। जब अंतिम व्यक्ति से पूछा जाता है कि उसने क्या सुना तो वह बात बिल्कुल बदल चुकी होती है।
यह बात साहित्य अकादमियों द्वारा करवाए जा रहे अनुवादों पर खरी उतरती है। अकादमियों द्वारा अनुवाद के लिए पुस्तकें कभी-कभी ऐसे रचनाकारों को भी दे दी जाती हैं जिनका उस कृति की मूल भाषा से कोई लेना-देना नहीं होता। अतः मूल कृति का लेखक किसी अन्य व्यक्ति से उस कृति का हिंदी या अंग्रेजी में (लिप्यांतर) करवाता है, फिर वह अनुवादक उस लिप्यांतर से अपनी भाषा में उसका अनुवाद करता है। अतः ये अनुवाद नहीं होकर अनुवाद का अनुवाद हो गया।
जब हम किसी साहित्यिक कृति का उसकी मूल भाषा से अन्य भाषा में अनुवाद करते हैं तो वह मात्र लिप्यांतर नहीं होता। क्योंकि शब्द केवल अर्थ बताने का साधन नहीं है, बल्कि वह भाव, ध्वनि, चित्र और संवेदना भी पैदा करता है। किसी कविता के भावानुवाद के लिए अनुवादक को पहले कविता के भाव तक पहुंचना होता है। यह तभी संभव है जब मूल कविता के कवि ने जिस भावभूमि में बैठकर रचा है, उसी भावभूमि में पहुंचा जाए। उसके भाव को समझना और उस भाव को दूसरी भाषा के शब्दों का जामा पहनाना। यह परकाया प्रवेश करने जैसा कार्य है।
इसलिए कविता का अनुवाद आसान नहीं होता। क्योंकि कविता के भाव पक्ष के साथ-साथ उसकी एक आंतरिक लय भी है। उसका निर्वाह भी करना होता है। इस लय के साथ मूल रचनाकार के भाव को बचाना और उसे लक्ष्य भाषा में प्रकट करना। यह श्रमसाध्य कार्य तो है ही, उच्च प्रतिभा व विषय की गहरी समझ भी मांगता है।
कई बार अनुवादक को मूल रचनाकार से भी अधिक श्रम करना पड़ता है। हम जानते हैं कि भाषा में ही संस्कृति बची रहती है। अतः अनुवादक दो भाषाओं को ही नहीं, दो संस्कृतियों को भी जोड़ रहा होता है। अनुवादक को दोनों भाषाओं के शब्द-संस्कारों से परिचित होना चाहिए। वह रचनाकार की आवाज को एक नई भाषा में जीवन देता है। उसकी सोच को नई भाषा में प्रतिष्ठा देता है।
अनुवादक को स्रोत भाषा (जिससे अनुवाद होना है) एवं लक्ष्य भाषा (जिसमें अनुवाद होना है) दोनों की शब्दावली, व्याकरण, मुहावरे और लहजे की समझ होनी चाहिए, अन्यथा वह रचना के साथ न्याय नहीं कर पाएगा।
भाषा के साथ संस्कृति भी जुड़ी रहती है। अतः अनुवादक को दोनों भाषाओं की संस्कृतियों की समझ होनी चाहिए। परंपरा, प्रतीक और संदर्भ समझने की क्षमता तभी उसमें होगी, जब वह दोनों भाषाओं की संस्कृतियों को समझ रहा होगा।
अनुवादक को संवेदनशील और सृजनात्मक भी होना चाहिए। जहां तक कविता का सवाल है, उसकी आत्मा को वह तभी पकड़ पाएगा जब वह संवेदनशील और सृजनशील है।
अनुवाद की भाषा स्पष्ट और प्रभावपूर्ण होनी चाहिए। अनुवाद पढ़ते समय पाठक को ऐसा लगे कि जैसे वह मूल स्वाभाविक रचना पढ़ रहा है। अनुवादक रचना पर अपनी राय नहीं थोपता, अपना मत जाहिर नहीं करता। वह मूल रचना का आशय जस का तस अन्य भाषा में पहुंचाता है।
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि किसी चीज को मैं उतना ही देख पाऊंगा जितनी मेरी देखने की क्षमता है। जैसे कोई पेड़ मुझे हरा दिख रहा है तो इसका हरापन मेरी आंख के रेटिना की क्षमता पर निर्भर करता है। दूसरे व्यक्ति को वह वैसा हरा नहीं दिखेगा जैसा मुझे दिख रहा है। उसे अपनी आंख के रेटिना की क्षमता के अनुसार हरा दिखेगा।
अतः किसी रचना को मैं अपने अनुभव, अपनी क्षमता, अपनी संवेदना के स्तर तक महसूस करता हूं तो उसके रूपांतरण में कहीं न कहीं मेरा होना शामिल हो जाता है।
अंत में-
उमर खय्याम की रुबाइयों का अंग्रेजी में एडवर्ड फिट्जगेराल्ड द्वारा किया गया अनुवाद इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। फिट्जगेराल्ड ने 1859 में इसका पहला संस्करण प्रकाशित किया। यह अनुवाद विवादास्पद रहा। अनेक रूबाइयों को बदलकर, जोड़कर अपनी विक्टोरियन संवेदना के साथ प्रस्तुत किया गया।
मूल फारसी में जहां सूफियाना संकेत है, दार्शनिक गहराई है और कई स्तरों वाले अर्थ है वही फिट्ज गेराल्ड के अनुवाद में जीवन क्षणभंगुरता, मदिरा प्रेम और वर्तमान क्षण को जीने की भावना अधिक मुखर हो जाती है। उन्होंने ख्याम को कहीं-कहीं भोगवादी की तरह प्रस्तुत किया है, जबकि मूल में आध्यात्मिक व दार्शनिक परतें कहीं अधिक जटिल है।
उमर खय्याम कबीर व फरीद की परंपरा के सूफी संत थे। अतः जब हम अनुवाद करते हैं तो रचनाकार की पृष्ठभूमि की जानकारी भी हमें होनी चाहिए।






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