स्क्रीन के हवाले बचपन
आभासी दुनिया की चमक में बच्चों का वास्तविक बचपन और मानसिक शांति दोनों खोते जा रहे हैं। अत्यधिक स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया के एडिक्शन से उपजी चिंताओं, शोध के साक्ष्यों और खेल, स्वाध्याय व वास्तविक...

मायाजाल
डॉ. गौरव बिस्सा,
एसोसिएट प्रोफेसर, राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज, बीकानेर
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अति-भौतिकवादी युग में परिवारों में एकल संस्कृति जन्म ले रही है। संबंध दरकते से नजर आ रहे हैं। अहंकार, परिवारों में सत्ता के केंद्र का बदलाव, सोशल मीडिया का अनुचित दखल, अत्यंत व्यस्त जीवनशैली, ज़बरदस्त उपभोक्तावाद और पैसे कमाने की अंधी दौड़ के चलते आज बच्चों का बचपन छिन-सा गया है। बच्चे बच्चे होकर भी मानो बच्चे नहीं हैं, क्योंकि वे स्क्रीन के मायाजाल में उलझे हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट के भरोसे आज बचपन मानो कैद है। छोटे बच्चे को भोजन करवाने से लेकर पढ़ाई तक, हर जगह स्क्रीन का जाल प्रमुखता से नजर आ रहा है।
मोबाइल और इंटरनेट मनुष्यों की सुविधा के लिए हैं; जीवन के आनंद को छीनने के लिए नहीं। इसके एडिक्शन ने जीवन का सुख और रस मानो छीन लिया है। स्टेटस अपडेट के प्रति दीवानगी, हर पल वीडियो बनाने की आतुरता और आभासी दुनिया में जीने की ललक ने मानो युवा वर्ग को ‘सेल्फ सेंटर्ड’ बना दिया है। किसी समारोह में जाते ही सबसे पहले उस समारोह के वीडियो बनाने या फोटो खिंचवाने की बात करना, समारोह का आनंद लेने के बजाय यह विचार करते रहना कि किस फोटो या वीडियो को स्टेटस बनाना मुफ़ीद रहेगा, हर समस्या का जवाब गूगल पर तलाशना और कागज़ की किताब पढ़ने के बजाय ई-बुक्स को प्रमुख मानना आज का नया शगल है। इसके कारण स्क्रीन टाइम इतना बढ़ गया है कि यह एक स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर रहा है। शोध भी यही समझाते हैं।
77 फीसदी युवा ‘नोमोफोबिया’ के शिकार
इंटरनेट एडिक्शन पर हुए शोध इसके गंभीर परिणाम उजागर करते हैं। समूचे विश्व की 164 प्रमुख इंटरनेट कंपनियों ने अमरीका के ‘सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रन’ से शोध करवाया, जिसकी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में वेबसाइट्स पर बाल यौन उत्पीड़न संबंधी 7 करोड़ फोटोज़ या वीडियोज शेयर किए गए। इस संख्या में एक साल में ही 50 फीसदी उछाल आया है, जो अत्यंत भयावह है। वहीं, महीने में औसतन 11 जीबी इंटरनेट डेटा खर्च करके हम भारतीय दुनिया में सबसे आगे हैं। एक मोबाइल हैंडसेट निर्माता कंपनी के अनुसार 84 फीसदी लोग सुबह उठते ही 15 मिनट मोबाइल देखते हैं। औसतन एक भारतीय प्रतिदिन लगभग साढ़े सात घंटे स्क्रीन पर बिताता है और एक घंटे में पांच बार फोन अनलॉक करता है। इसके अलावा, ‘सिक्योर एनवॉय’ के शोध के मुताबिक 18 से 24 वर्ष के 77 फीसदी युवा ‘नोमोफोबिया’ के शिकार हैं, यानी मोबाइल से दूर होने पर लगने वाला भय और डिस्ट्रक्टिव एंग्जायटी।
ऊपरी दिखावा जीवन का सच नहीं हो सकता। इंटरनेट एडिक्शन यह दर्शाता है कि हमारे परस्पर प्रेमपूर्ण संबंध इतने कमज़ोर हो चुके हैं कि हमें अपने हर कार्य पर दूसरों की टिप्पणी की ज़रूरत महसूस होने लगी है। दूसरे आपकी बात का समर्थन करें, क्या यह आवश्यक है? सोशल मीडिया पर हर बात लिखकर आप सराहना और दूसरों से स्वीकारोक्ति ही तो चाहते हैं। अब पुनः सोचें कि क्या आप खुद की नज़र में इतने अशक्त और निर्बल हैं कि जब तक दूसरे लोग आपके कृत्यों को अच्छा नहीं कह देते या उसे स्वीकार नहीं कर लेते, तब तक आपको यह विश्वास ही नहीं होता कि आपने कुछ अच्छा किया है? इस पर विचार करना ज़रूरी है।
सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध पर विचार
क्या ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया को एक उम्र-विशेष तक प्रतिबंधित किया जाना एक समाधान हो सकता है? हाल ही में कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में 16 वर्ष से कम आयु वर्ग के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग प्रतिबंधित किया गया है। ऑस्ट्रेलिया में भी 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग प्रतिबंधित है। स्पेन, ब्रिटेन, यूनान आदि देश इस दिशा में कानून बनाने की तैयारी में हैं और भारत सरकार भी इस दिशा में विचारशील है।
स्क्रीन के इस चक्रव्यूह को तोड़ने का पहला उपाय है- खेलिए। समझें कि वर्चुअल दुनिया ही सब कुछ नहीं होती। बेशक इंटरनेट बहुत ज़रूरी है, लेकिन प्रत्येक समस्या का समाधान इंटरनेट पर खोजना मूर्खता है। ईमेल, इंटरनेट आदि की जानकारी और एक्सपर्टीज ज़रूर होनी चाहिए, लेकिन इसका दास बनना अनुचित है। स्क्रीन पर उंगलियां घुमाने के बजाय शरीर को कार्यशील बनाने से समाज और स्वास्थ्य में ऊर्जा आती है। स्क्रीन पर गेम्स खेलने से शरीर सक्रिय नहीं होता, मैदान पर जाकर खेलने से सक्रियता बढ़ती है। अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेलना व्यक्तित्व के समग्र विकास की रीढ़ है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने 3 से 7 साल तक के 1,700 बच्चों पर शोध करके यह निष्कर्ष निकाला है कि जो बच्चे अपने हमउम्र साथियों के साथ खेलते हैं, उनका मानसिक और शारीरिक विकास कहीं अधिक बेहतर होता है।
दूसरा उपाय है- पढ़िए। हमारी वर्तमान स्थिति ऐसी है कि किसी भी जानकारी के लिए पुस्तकों का अध्ययन करना तो बीते ज़माने की बात लगने लगा है। हर प्रश्न को नेट पर सर्च करना अनुचित है; जो ज्ञान कागज़ की पुस्तक दे सकती है, वह इंटरनेट नहीं दे सकता। वर्तमान समय में बढ़ रहे अपराधों को कम करना हो या अपनी संस्कृति व मूल्यों का संरक्षण करना हो, पुस्तकों को पढ़ने की आदत से ही इन समस्याओं का समाधान मुमकिन है। जातिवाद, अंधविश्वास, गृह-क्लेश और तलाक आदि मुद्दों के बढ़ने का एक प्रमुख कारण स्वाध्याय (सेल्फ स्टडी) की कमी भी है। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवाओं के अलावा, आज के सामान्य युवा वर्ग को समाज, राष्ट्र, वित्त, विदेश नीति आदि की न्यूनतम जानकारी भी नहीं है। रोज़ पुस्तक का सिर्फ एक पृष्ठ पढ़ने, मात्र सौ शब्द लिखने और रोजाना आधा घंटा समाचार सुनने से जो आत्मविश्वास बढ़ता है, वह अकल्पनीय है।
उल-जुलूल कंटेंट देखने की लत
ज़रा सोचिए कि अपने मूल काम करने के बाद बच्चा अपने घर पर क्या करता है? उसका जवाब है टीवी देखना, इंटरनेट पर उल-जुलूल कंटेंट देखना या गेम्स खेलना और अंत में सोशल मीडिया पर अनावश्यक समय बिताना। इसमें अभिभावक भी कम दोषी नहीं हैं, क्योंकि स्क्रीन एडिक्शन की बीमारी से वे खुद भी त्रस्त हैं, इसलिए वे बच्चों को इसका बुरा असर समझाने में नाकाम रहते हैं। साथ ही, बड़ों में भी किताबें पढ़ने की प्रवृत्ति घट रही है। क्या सिर्फ कमाना, खाना-पीना और सोशल मीडिया देखना ही जीवन है? दरअसल मनुष्य कमा रहा है, शारीरिक कसरत भी कर रहा है, लेकिन उसे मेंटल फिटनेस की चिंता कतई नहीं है। मानसिक सुदृढ़ता सोशल मीडिया से नहीं, बल्कि पुस्तकें पढ़ने से आती है। मानसिक संबल और ज्ञानार्जन के लिए अभिभावकों द्वारा स्वयं पढ़ना और बच्चों में पठन की आदत डालना समय की मांग है।
तीसरा उपाय है- पारस्परिक मेलजोल बढ़ाना। आज के दौर में सोशल मीडिया क़रीब लाने के बजाय दूरियां बढ़ाता प्रतीत हो रहा है। पहले साल में दो से तीन बार अपनों से मिल लिया जाता था, उनकी कुशलक्षेम पूछी जाती थी। त्योहार के बहाने मिलने पर कई गिले-शिकवे दूर हो जाया करते थे, मन का गुबार निकलता था और मेंटल वेंटिलेशन होता था। अब दुनिया एक स्क्रीन और अंगूठे तक सीमित हो गई है। मेलजोल, संवाद और हंसी-मज़ाक से अनेक मानसिक समस्याएं स्वतः दूर हो जाती हैं, अतः इस मानवीय संपर्क को पुनः जीवित करना होगा।
अंततः आंतरिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना सर्वाधिक आवश्यक है। सोचिए कि किसी व्यक्ति को सांप ने काट लिया, तो वह सबसे पहले क्या करेगा? ज़हर का असर समाप्त करने के लिए एंटी-वेनम इंजेक्शन लेगा। इससे यह स्पष्ट है कि खून के अंदर फैले ज़हर को खत्म करना पहली प्राथमिकता है। अब दूसरे पहलू पर विचार कीजिए—शरीर से आप स्वस्थ हैं, लेकिन अंतर्मन से अशांत हैं, क्योंकि सोशल मीडिया पर आपकी फोटो पर आए किसी कमेंट या परिचित द्वारा पोस्ट लाइक न करने की बात मन को पीड़ा दे रही है। अब इलाज किसका करेंगे- बाहरी शरीर का या अंतर्मन का? आभासी इंटरनेट की दुनिया मायाजाल है; वहां जो दिखता है, वह पूर्ण सत्य नहीं है। न तो वहां की हर प्रशंसा सच्ची है और न ही हर आलोचना। इसे समझें और अनावश्यक टिप्पणियों की परवाह किए बिना अपने वास्तविक कर्म पर ध्यान दें। जीवन की समस्त गुत्थियों का समाधान इंटरनेट नहीं हो सकता; इसका उपयोग विवेकपूर्ण और बुद्धिमत्ता से होना चाहिए, यही स्वस्थ जीवन का मूल मंत्र है।






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