कविता का लोकतंत्र और लोकतंत्र की कविता
बाज़ार, भीड़ और आभासी लोकप्रियता के दौर में कविता साध्य न रहकर साधन बनती जा रही...

अभिव्यक्ति
दिनेश सिंदल,
कवि, लेखक
Table Of Content
लोकतंत्र हर सामान्य नागरिक की आवाज़ है, उसकी चेतना है और यही उसकी ताक़त भी है। कविता भी जन-सामान्य की आवाज़ को संवेदनात्मक तरीक़े से प्रकट करती है। लेकिन लोकतंत्र में योग्यता को मान्यता नहीं मिलती, लोकप्रियता को मिलती है। जिसके पीछे ज़्यादा भीड़, उसके हाथ में ताक़त। लोकतंत्र ने भीड़ को ताक़त दी। सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के वोट की क़ीमत भी उतनी ही है जितनी किसी आदिवासी अनपढ़ महिला के वोट की।
आजकल कवि भी लोकप्रियता के पीछे भाग रहा है। वह अपने फ़ॉलोअर्स बढ़ा रहा है, लाइक्स व कमेंट्स की चिंता कर रहा है। इसके लिए वह जनता का मूड देखकर लिख रहा है। यानी कि जनता (भीड़) के स्तर पर उतर कर बात कर रहा है, जबकि होना यह चाहिए था कि वह जनता के स्तर को ऊपर उठाकर अपने स्तर तक ले आए।
लोकप्रियता श्रेष्ठता का आधार हो गई। यह बाज़ार का प्रभाव है। बाज़ार में किसी वस्तु की क़ीमत उसकी मांग से होती है। इस बाज़ार की दुनिया में कविता भी वस्तु बन गई। वह साधन होकर रह गई, साध्य नहीं। पद, प्रतिष्ठा, पुरस्कार पाने का साधन; अपने राजनीतिक, सामाजिक एजेंडे को प्रकट करने का साधन।
फ़ोकस कविता बेचने पर
आज के कवि का फ़ोकस कविता बेचने पर है। वह बाज़ार में खड़ा है। बाज़ार में सफल होने के लिए लोगों के इमोशंस को टच करना होता है। अगर किसी को किसी काम के लिए राज़ी करना है या मजबूर करना है, तो तर्क से बात नहीं बनेगी। उसके इमोशंस को हवा देनी होगी, उसके लालच को हवा देनी होगी। इंसान का दिमाग़ इंसेंटिव को फ़ॉलो करता है, एडवाइस को नहीं।
कविता स्वतःस्फूर्त प्रेरणा है। इंसेंटिव बाहरी कारण है जो किसी व्यक्ति को कुछ करने के लिए प्रेरित करता है। इंसेंटिव किसी लक्ष्य की प्राप्ति के बाद दिया जाने वाला पुरस्कार होता है। यानी कि इसमें देने वाले का स्वार्थ सिद्ध होता है। इस तरह इंसेंटिव धोखेबाज़ को पावरफ़ुल बनाता है।
कविता अकेले की यात्रा है। रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था-‘एकला चलो रे’। कविता बाज़ार की तलाश नहीं, अपनी तलाश है। यह भीतर की यात्रा है। मैंने कभी कहा था कि कवि कविता रचता है और कविता उस कवि को रचती है। कविता के साथ-साथ कवि का रूपांतरण भी होता है।
बाज़ारोन्मुख कवि हर क़ीमत पर चमकना चाहता है, चाहे उसे चमक के लिए कितने ही अंधेरों से समझौता क्यों न करना पड़े। वह सफल होना चाहता है। सफल यानी जिस लक्ष्य को लेकर चला है उसका पूरा होना।
व्यापक होती है कवि की दृष्टि
राजनीति का हित इसमें है कि लोग बंटे हुए रहें। वह लोगों को जाति, धर्म, भाषा, लिंग के नाम पर बांटेगी। बाज़ार भी नहीं चाहेगा कि क्रेता और विक्रेता के बीच कोई भावनात्मक रिश्ता बने।
आज हमारी कविता भी नव-विमर्श के नाम पर इन्हीं खांचों में बंट गई, जबकि कविता जोड़ने का काम करती है। वह इन सब बैरियर्स को तोड़कर मनुष्य को मनुष्य की तरह देखने का आग्रह करती है। कविता परिवर्तन की चेतना निर्मित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कवि की दृष्टि व्यापक होती है। वह सभी वादों, विचारधाराओं से ऊपर उठकर बात करता है। उसके लिए मनुष्य और समाज का हित पहले है। कविता असहमति को समर्थन देती है। साहित्य के संसार में अनेक विचार, अनेक स्वर, अनेक अनुभव व अनेक दृष्टियां एक साथ उपस्थित रहती हैं।
लोकतांत्रिक चेतना से संपन्न कविता का दायित्व केवल लोकप्रिय होना नहीं, बल्कि जनता में विवेक जगाना भी है। कवि जनता का प्रतिनिधि होता है। जनता की बात को सच्चाई से, पुरज़ोर तरीक़े से सामने रखता है।
कविता का प्रतिरोध केवल नारे लगाने से उत्पन्न नहीं होता। कविता की वास्तविक शक्ति उसकी कलात्मक और वैचारिक स्वतंत्रता के मेल में निहित है।
कवि का दायित्व किसी राजनीतिक दल या विचारधारा का स्थायी प्रवक्ता बन जाना नहीं है। उसकी निष्ठा मनुष्यता, सत्य, न्याय व संवेदना के प्रति होनी चाहिए। सत्ता की प्रशंसा में आलोचनात्मक दृष्टि छूट जाती है और उसके विरोध के आग्रह में कलात्मकता व विचारशीलता छूट जाती है।
हमारे देश में ‘लोक’ राज नहीं करता है, पार्टियां राज करती हैं। और पार्टी जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र के आधार पर बनती है और इन्हीं का सहारा लेकर अपने को मज़बूत करती है। माना कि लोकतंत्र जीवित रखने के लिए संस्थाओं की आवश्यकता होती है, लेकिन ये संस्थाएं स्वयं कितनी लोकतांत्रिक हैं?
सवाल यह भी है कि जब हम ‘लोक’ की बात करते हैं तो कौन-सा लोक? वह जो गांव में श्रम करते हुए कुछ नया सृजित कर रहा है, सीमा पर मोर्चा ताने खड़ा सरहद की रक्षा कर रहा है, खेतों में धरती का सीना चीर कर अन्न उपजा रहा है, या वह जो जंतर-मंतर पर सत्ता को गरिया रहा है? हमारा लोक बंटा हुआ है।
कविता इन सब की आवाज़ बनती है। कविता न चुनाव लड़ती है, न क़ानून बनाती है और न ही शासन चलाती है, फिर भी वह नागरिक चेतना को प्रभावित करती है। कविता संवाद की संभावना को जीवित रखती है। जिस कविता में मनुष्य की स्वतंत्रता, समानता तथा गरिमा के लिए जगह है, वह लोकतंत्र को अधिक मानवीय बनाने में योगदान देती है। कविता लोकतंत्र की संवेदनशील सहयात्री होनी चाहिए।






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