स्वयं अपनी परिभाषाएं लिख रही हैं महिलाएं
मिसेज वर्ल्ड का खिताब जीतने वाली अदिति गोवित्रिकर इस बात पर जोर देती हैं कि महिलाओं की वास्तविक पहचान उनके आत्मविश्वास व अनुभव के प्रति दृष्टिकोण से बनती...

उम्र, विवाह और परंपरागत सीमाओं से आगे बढ़ती नई सोच
अदिति गोवित्रिकर का नजरिया
भारत में जब सौंदर्य प्रतियोगिताओं की चर्चा होती है तो आमतौर पर अविवाहित प्रतिभागियों और ग्लैमर की दुनिया का चित्र सामने आता है। लेकिन अदिति गोवित्रिकर का मानना है कि किसी महिला की पहचान केवल उसकी वैवाहिक स्थिति, उम्र या बाहरी रूप से तय नहीं होनी चाहिए। यही सोच उनके पूरे जीवन और करियर में दिखाई देती है।
मिसेज वर्ल्ड का खिताब जीतकर इतिहास रचने वाली अदिति गोवित्रिकर आज भी इस बात पर जोर देती हैं कि महिलाओं की वास्तविक पहचान उनके आत्मविश्वास, अनुभव और जीवन के प्रति दृष्टिकोण से बनती है। उनका मानना है कि समाज ने लंबे समय तक महिलाओं को कुछ निश्चित दायरों में बांधकर देखने की कोशिश की, लेकिन अब समय बदल रहा है और महिलाएं स्वयं अपनी सफलता की परिभाषा लिख रही हैं।
Table Of Content
चिकित्सा विज्ञान ने जीवन को देखने का नजरिया दिया
अदिति के अनुसार यदि उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण पहचान चुननी हो तो वह डॉक्टर की होगी। उनका कहना है कि चिकित्सा विज्ञान ने उन्हें केवल एक पेशा नहीं दिया बल्कि जीवन को देखने का नजरिया भी दिया। मरीजों के साथ काम करने और मानव पीड़ा को करीब से समझने ने उन्हें सहानुभूति, अनुशासन और धैर्य सिखाया। उनका मानना है कि ग्लैमर की दुनिया ने उन्हें लोकप्रियता और पहचान दी, लेकिन मनुष्य को समझने की दृष्टि चिकित्सा शिक्षा से मिली।
उनका मानना है कि हर व्यक्ति के जीवन में संघर्ष, कमजोरियां और अनकही कहानियां होती हैं जो अक्सर दिखाई नहीं देतीं। यही समझ उन्हें एक कलाकार, उद्यमी, मनोवैज्ञानिक, वेलनेस विशेषज्ञ और मां के रूप में बेहतर बनाती रही है।
मेनोपॉज को लेकर गलत धारणाएं
महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर भी अदिति की सोच बेहद स्पष्ट है। उनका मानना है कि भारतीय समाज में आज भी उम्र बढ़ने और मेनोपॉज को लेकर कई तरह की गलत धारणाएं मौजूद हैं। अक्सर महिलाएं मेनोपॉज को युवावस्था के अंत के रूप में देखती हैं जबकि यह जीवन के एक नए और अधिक परिपक्व चरण की शुरुआत हो सकता है।
अदिति के अनुसार सबसे बड़ी समस्या यह है कि महिलाएं अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं देतीं। वे परिवार और जिम्मेदारियों में इतनी व्यस्त रहती हैं कि अपनी जरूरतों को पीछे छोड़ देती हैं। नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, संतुलित आहार, व्यायाम, तनाव प्रबंधन और हार्मोनल परिवर्तनों की समझ जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बना सकती है। उनका मानना है कि थकान, अनिद्रा, मूड में बदलाव या वजन बढ़ना ऐसी समस्याएं नहीं हैं जिन्हें चुपचाप सहन किया जाए। इनके समाधान उपलब्ध हैं और महिलाओं को सहायता लेने में संकोच नहीं करना चाहिए।
आत्मविश्वास में छुपी है वास्तविक सुंदरता
सौंदर्य की बदलती परिभाषा पर भी अदिति की अपनी राय है। वे मानती हैं कि सोशल मीडिया ने अवसरों का लोकतंत्रीकरण किया है और अब प्रतिभाशाली लोगों के लिए मंच तक पहुंचना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो गया है। लेकिन इसके साथ ही एक नई चुनौती भी पैदा हुई है। फिल्टर और कृत्रिम रूप से निर्मित सुंदरता ने लोगों पर एक अवास्तविक दबाव बनाया है।
उनका मानना है कि वास्तविक सुंदरता किसी चेहरे या शरीर की बनावट में नहीं बल्कि आत्मविश्वास और आत्मस्वीकृति में होती है। जो व्यक्ति स्वयं के साथ सहज होता है वही सबसे अधिक आकर्षक दिखाई देता है। यही कारण है कि वे विविधता, समावेशिता और बॉडी पॉजिटिविटी से जुड़ी बढ़ती चर्चाओं को एक सकारात्मक बदलाव मानती हैं।
बच्चों की भावनाओं को गंभीरता से लें
बच्चों की सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर भी अदिति बेहद मुखर हैं। उनका मानना है कि परिवार अक्सर यह गलती करते हैं कि खतरे को केवल अजनबियों से जोड़कर देखते हैं जबकि कई बार दुर्व्यवहार परिचित और भरोसेमंद लोगों के बीच भी हो सकता है। वे परिवारों से आग्रह करती हैं कि बच्चों की भावनाओं और व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों को गंभीरता से लें।
उनके अनुसार बच्चों को बचपन से ही व्यक्तिगत सीमाओं और सहमति की समझ दी जानी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि परिवार ऐसा वातावरण बनाए जहां बच्चा बिना किसी डर के अपनी बात कह सके। अदिति मानती हैं कि चुप्पी अक्सर अपराधियों की रक्षा करती है जबकि संवाद बच्चों की सुरक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम है।
पुरस्कारों से नहीं आंकी जाती सफलता
अपने मिसेज वर्ल्ड खिताब को लेकर अदिति स्वीकार करती हैं कि उस समय समाज विवाहित महिलाओं की उपलब्धियों को उसी नजर से नहीं देखता था जिस नजर से अविवाहित प्रतिभागियों की सफलताओं को देखा जाता था। हालांकि वे यह भी कहती हैं कि उन्होंने कभी अपनी सफलता का मूल्य केवल पुरस्कारों या प्रचार से नहीं आंका।
उनके अनुसार उस उपलब्धि ने हजारों महिलाओं को यह विश्वास दिया कि विवाह या मातृत्व किसी महिला के सपनों की अंतिम सीमा नहीं है। आज वे स्वयं देख रही हैं कि 30, 40, 50 और यहां तक कि 70 वर्ष की महिलाएं भी नए सपनों और नए आत्मविश्वास के साथ जीवन की नई शुरुआत कर रही हैं।
बोझ नहीं होती उम्र
मेनोपॉज के अपने अनुभवों को साझा करते हुए अदिति बताती हैं कि एक डॉक्टर होने के बावजूद उन्होंने महसूस किया कि हार्मोनल परिवर्तन शरीर और मन को कितनी गहराई से प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन उन्होंने इन बदलावों को कमजोरी नहीं बल्कि जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया। आज उनका ध्यान उम्र को रोकने पर नहीं बल्कि स्वस्थ, मजबूत और ऊर्जावान बने रहने पर है। नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, संतुलित भोजन और मानसिक संतुलन उनकी दिनचर्या के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। वे मानती हैं कि उम्र कोई बोझ नहीं बल्कि अनुभव, ज्ञान और परिपक्वता की पूंजी है।
अदिति गोवित्रिकर की सोच का सार यही है कि पहचान किसी उपाधि, उम्र या बाहरी सफलता से नहीं बनती। वास्तविक पहचान उस नजरिये से बनती है जिसके साथ व्यक्ति जीवन को देखता और जीता है। शायद यही कारण है कि वे आज भी अनेक महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं।






No Comment! Be the first one.