शहर हमारा है, जिम्मेदारी किसकी?
चुनाव खत्म हो गए, अब बारी काम की है। साफ सड़क, स्वच्छ गली, रोशन रास्ते और समय पर होने वाले छोटे-छोटे काम ही तय करेंगे कि जनता ने जिसे चुना, उसने उसके भरोसे की कितनी कद्र...

जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही
सुबह घर से निकलिए। दरवाजे के सामने कचरा उठाने वाली गाड़ी आ गई है। घर का कचरा उसमें डाल दिया गया। गाड़ी आगे बढ़ गई। देखने वाले को लगेगा कि सफाई का काम हो गया। लेकिन गली में कुछ कदम आगे बढ़ते ही नाली के किनारे पड़ा कचरा, सड़क पर बिखरे कागज-प्लास्टिक और जगह-जगह जमा गंदगी बता देती है कि कहानी इतनी आसान नहीं है।
Table Of Content
- जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही
- कचरा उठाना ही सफाई नहीं
- दुनिया के कुछ शहरों ने दिखाया है रास्ता
- इंदौर की मिसाल, लेकिन सवाल भी
- पार्षद सिर्फ पार्षद नहीं, जनता का आदमी है
- सरकारी दफ्तर में अटका काम भी जनता की समस्या है
- जनसेवा के छोटे काम, बड़ी राहत
- जनता को भी आईना देखना होगा
- केवल शिकायत नहीं, हिसाब मांगना भी जरूरी
- पांच साल बाद सवाल यही होने चाहिए
हमारे शहरों में सफाई का मतलब कई बार बस इतना रह गया है कि घर-घर से कचरा उठा लिया जाए। उसके बाद वह कचरा कहां जाता है, गली कितनी साफ है, नाली कब साफ हुई, सड़क के किनारे कितनी गंदगी जमा है और सार्वजनिक स्थानों की स्थिति क्या है, इन सवालों पर ध्यान कम जाता है। अब नगर निकाय चुनाव हो चुके हैं। जनता ने अपने-अपने वार्ड के प्रतिनिधि चुन लिए हैं। किसी ने विकास का भरोसा दिया होगा, किसी ने सफाई का, किसी ने सड़क और नाली का, किसी ने पानी और रोशनी का। किसी ने कहा होगा कि वह हर समय जनता के बीच रहेगा। अब भाषण और वादे पीछे छूट चुके हैं। सामने पांच साल हैं।
यही वह समय है जब जनता को भी अपने प्रतिनिधि से कुछ सवाल पूछने चाहिए। क्या हमारा वार्ड पहले से ज्यादा साफ होगा? क्या खराब सड़क समय पर ठीक होगी? क्या नाली जाम होने पर शिकायत के लिए कई चक्कर लगाने पड़ेंगे? क्या स्ट्रीट लाइट खराब होने पर अंधेरे में रहने की मजबूरी होगी? और सबसे बड़ा सवाल, क्या हमारा पार्षद हमारी समस्या सुनने के लिए वास्तव में हमारे बीच मौजूद रहेगा? लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि इन सवालों को पूछना किसी की कृपा पर निर्भर नहीं है। जनता ने प्रतिनिधि चुना है तो उससे काम का हिसाब मांगना भी उसका अधिकार है।
कचरा उठाना ही सफाई नहीं
किसी शहर की पहचान उसके बड़े भवनों, चौड़ी सड़कों और चमकते बाजारों से जरूर होती है, लेकिन उसकी असली तस्वीर अक्सर किसी छोटी गली में दिखाई देती है। वहां की सफाई, नाली, सड़क, स्ट्रीट लाइट और सार्वजनिक स्थान बता देते हैं कि शहर की व्यवस्था जमीन पर कैसी है। कई शहरों में सुबह कचरा संग्रहण करने वाली गाड़ी नियमित पहुंचती है। यह अच्छी बात है। लेकिन क्या केवल घरों से कचरा उठा लेना सफाई की पूरी जिम्मेदारी है?
गली की सफाई कौन करेगा? नालियों की नियमित सफाई कौन देखेगा? सड़क किनारे जमा कचरा कौन हटाएगा? सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने वालों पर निगरानी कौन रखेगा? बारिश से पहले नालियां साफ हैं या नहीं, इसकी चिंता कौन करेगा? इन सवालों का जवाब केवल सफाईकर्मी नहीं दे सकते। इसके लिए पूरी व्यवस्था को जिम्मेदार होना पड़ेगा और चुने हुए जनप्रतिनिधियों को उस व्यवस्था पर नजर रखनी होगी।
दुनिया के कुछ शहरों ने दिखाया है रास्ता
दुनिया के कुछ शहरों को देखकर यह समझा जा सकता है कि सफाई केवल झाड़ू लगाने से नहीं आती। सिंगापुर में सार्वजनिक स्थानों की सफाई के साथ नागरिक अनुशासन और नियमों का पालन कराने पर भी जोर दिया जाता है। कूड़ा फैलाने पर जुर्माने की व्यवस्था है और कुछ मामलों में दोषियों को सार्वजनिक सफाई से जुड़े काम भी करने पड़ते हैं।
टोक्यो में भी सार्वजनिक सफाई केवल सरकारी कर्मचारियों के भरोसे नहीं है। नागरिकों को कचरा न फैलाने, अपना कचरा अपने साथ रखने और स्थानीय सफाई अभियानों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाता है। वहां यह सोच विकसित की गई है कि सार्वजनिक जगह किसी और की नहीं, सभी की है।
ज्यूरिख जैसे शहरों में भी सार्वजनिक स्थानों की नियमित सफाई और नागरिक भागीदारी पर जोर है। वहां भी गंदगी की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन उसे नजरअंदाज करने के बजाय व्यवस्था लगातार उससे निपटने का प्रयास करती है। इन शहरों की तस्वीर देखते हुए हमारे सामने एक सीधा सवाल आता है। क्या हमारे शहरों में भी सफाई को केवल सफाईकर्मियों की जिम्मेदारी मानना बंद नहीं किया जाना चाहिए? साफ शहर के लिए सफाईकर्मी जरूरी हैं, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है व्यवस्था, निगरानी और नागरिक अनुशासन।
इंदौर की मिसाल, लेकिन सवाल भी
भारत में स्वच्छता की बात होती है तो इंदौर का नाम सामने आना स्वाभाविक है। स्वच्छ सर्वेक्षण में लगातार बेहतर प्रदर्शन करने वाले इंदौर ने देश के दूसरे शहरों के सामने एक उदाहरण रखा है। लेकिन किसी शहर की रैंकिंग और उसके हर मोहल्ले का अनुभव एक ही चीज नहीं होते।
इंदौर में रहने वाला व्यक्ति अपने मोहल्ले की सफाई को जिस तरह देखता है, वह किसी सर्वेक्षण की रैंकिंग से अलग अनुभव हो सकता है। इसलिए सवाल इंदौर की उपलब्धि पर संदेह करने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या किसी भी शहर की स्वच्छता की सफलता तब पूरी मानी जा सकती है, जब उसका हर वार्ड, हर गली और हर सार्वजनिक स्थान उसी स्तर की व्यवस्था महसूस करे? यही सवाल राजस्थान के शहरों से भी पूछा जाना चाहिए।
पार्षद सिर्फ पार्षद नहीं, जनता का आदमी है
पार्षद बनने के बाद किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी जिम्मेदारी शायद यही है कि वह अपने वार्ड से दूर न हो जाए। चुनाव के समय घर-घर पहुंचने वाला जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद भी उतना ही आसानी से लोगों के बीच पहुंच सके, यह लोकतंत्र की अच्छी तस्वीर होगी।
इसके लिए महीने में कम से कम एक बार वार्ड के लोगों के साथ खुली बैठक या जनसंवाद किया जा सकता है। कोई बड़ा मंच लगाने की जरूरत नहीं। मोहल्ले के लोगों के साथ बैठकर पूछा जाए कि उनकी सबसे बड़ी समस्या क्या है। हो सकता है किसी गली में नाली महीनों से साफ नहीं हुई हो। कहीं स्ट्रीट लाइट खराब हो। किसी सड़क पर गड्ढे हों। कहीं कचरा नियमित नहीं उठ रहा हो। किसी बुजुर्ग को पेंशन से जुड़ी परेशानी हो। किसी परिवार को किसी सरकारी योजना की जानकारी न हो।
जनता से सीधे बात करने पर ऐसी कई समस्याएं सामने आ सकती हैं, जो फाइलों में शायद कभी दर्ज ही नहीं होंगी। और इसका फायदा केवल जनता को नहीं होगा। पार्षद का अपने क्षेत्र से सीधा संपर्क भी बना रहेगा। उसे यह जानने के लिए चुनाव तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा कि लोग उसके काम से संतुष्ट हैं या परेशान।
सरकारी दफ्तर में अटका काम भी जनता की समस्या है
एक आम आदमी के लिए नगर निकाय ही पूरी दुनिया नहीं है। उसका सामना बिजली, पानी, राजस्व, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा, प्रमाण पत्र और दूसरे सरकारी विभागों से भी होता है। यदि किसी नागरिक का जायज काम किसी सरकारी कार्यालय में अनावश्यक रूप से अटक रहा है तो जनप्रतिनिधि की भूमिका केवल यह कहकर खत्म नहीं हो जानी चाहिए कि यह मेरे विभाग का काम नहीं है।
वह संबंधित अधिकारी से बात कर सकता है, नागरिक को सही प्रक्रिया बता सकता है और यह जान सकता है कि समस्या कहां अटकी है। इसका अर्थ किसी अधिकारी पर अनुचित दबाव बनाना नहीं, बल्कि नागरिक और प्रशासन के बीच जिम्मेदार सेतु बनना है। यही वह भूमिका है जिससे लोगों को महसूस होता है कि उनका चुना हुआ प्रतिनिधि केवल वोट मांगने के समय उनका अपना नहीं था।
जनसेवा के छोटे काम, बड़ी राहत
जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र में समय-समय पर स्वास्थ्य जांच या चिकित्सा परामर्श शिविर भी आयोजित करा सकते हैं। सरकारी योजनाओं, पेंशन, प्रमाण पत्र, सामाजिक सुरक्षा और दूसरी सुविधाओं की जानकारी देने वाले शिविर लगाए जा सकते हैं। संबंधित विभागों को एक जगह बुलाकर लोगों की समस्याओं का समाधान कराने की पहल की जा सकती है।
ऐसे काम किसी पार्षद का संवैधानिक दायित्व नहीं हैं, लेकिन जनसेवा की भावना का हिस्सा जरूर हो सकते हैं। एक बुजुर्ग को पेंशन की जानकारी मिल जाए, किसी महिला को सरकारी योजना का लाभ मिल जाए, किसी जरूरतमंद को समय पर स्वास्थ्य परामर्श मिल जाए या किसी व्यक्ति को सरकारी कार्यालय की प्रक्रिया समझ आ जाए तो यह भी जनप्रतिनिधि की भूमिका को सार्थक बनाता है।
जनता को भी आईना देखना होगा
हर बात के लिए जनप्रतिनिधि को जिम्मेदार ठहराना भी उचित नहीं होगा। सड़क पर कागज फेंकने वाला कौन है? नाली में प्लास्टिक डालने वाला कौन है? सार्वजनिक दीवार को गंदा करने वाला कौन है? कूड़ेदान पास होने के बावजूद सड़क पर कचरा डालने वाला कौन है? वह भी इसी शहर का नागरिक है।
इसलिए साफ शहर के लिए प्रशासन जितना जिम्मेदार है, नागरिक भी उतना ही जिम्मेदार है। फर्क इतना है कि नागरिक से नियमों का पालन करने की अपेक्षा है और जनप्रतिनिधि से यह अपेक्षा भी है कि वह व्यवस्था को काम करते हुए सुनिश्चित करे।
केवल शिकायत नहीं, हिसाब मांगना भी जरूरी
नगर निकाय के बजट में वार्ड के लिए कितना पैसा आया? कौन सा काम स्वीकृत हुआ? उसकी लागत कितनी है? काम कब तक पूरा होना है? कितना काम हुआ और कितना बाकी है? इन सवालों के जवाब जनता को मिलना चाहिए। आज तकनीक ने यह काम काफी आसान कर दिया है। वार्डवार काम, खर्च और शिकायतों की स्थिति सार्वजनिक की जा सकती है। इससे जनता को भी पता रहेगा कि उसके क्षेत्र में क्या हो रहा है और जनप्रतिनिधि तथा प्रशासन दोनों के लिए जवाबदेही भी तय होगी।
पांच साल बाद सवाल यही होने चाहिए
पांच साल बाद जनता को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि उसके पार्षद ने कितने उद्घाटन किए या कितने कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। उसे पूछना चाहिए कि उसके वार्ड में कितनी सड़कें सुधरीं, कितनी नालियां साफ हुईं, कितनी स्ट्रीट लाइटें ठीक हुईं, सफाई कितनी नियमित हुई और लोगों की कितनी शिकायतों का समाधान हुआ। यही किसी जनप्रतिनिधि के काम का वास्तविक हिसाब है।
पांच साल बहुत लंबा समय है। लेकिन जनता को अगले चुनाव तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है। उसे हर महीने, हर मौसम और हर जरूरी मौके पर अपने प्रतिनिधि से सवाल पूछना चाहिए। और जनप्रतिनिधियों को भी याद रखना चाहिए कि चुनाव जीतना मंजिल नहीं है। चुनाव के बाद जनता के बीच बने रहना, उसकी समस्या सुनना और उसका समाधान कराने के लिए प्रयास करना ही उस जीत को सार्थक बनाता है। आखिर शहर केवल सरकार का नहीं है। शहर जनता का है। जनता का काम केवल वोट देना नहीं और जनप्रतिनिधि का काम केवल चुनाव जीतना नहीं। लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव के बाद शुरू होती है।






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