विपक्ष के बिखराव का लाभ
विपक्षी दलों के बीच समन्वय की कमी और चुनावी मैदान में वोटों के बंटवारे का असर कई राज्यों में दिखाई देता रहा है। ऐसे में विपक्ष के सामने केवल सत्ता-विरोधी माहौल का लाभ उठाने की नहीं, बल्कि जनता के बीच...

लोकतंत्र की चुनौती
देश में महंगाई, बेरोजगारी, विषम आर्थिक हालात और पिछले वर्षों में पेपर लीक की घटनाओं के बावजूद सरकार की सेहत पर कोई खास असर नहीं दिखना विपक्ष की कमजोरी का संकेत देता है। आंकड़ों के मुताबिक अगस्त 2026 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा महंगाई दर 4.82 प्रतिशत रही, जबकि 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग में बेरोजगारी दर 5 प्रतिशत दर्ज की गई। इसी अवधि में युवा बेरोजगारी दर 15.1 प्रतिशत बताई गई है।
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ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विपक्ष के नेता जनता की समस्याओं को समझने में चूक कर रहे हैं? क्या वे सुविधाभोगी हो गए हैं या जनता से उनका जुड़ाव कमजोर पड़ गया है? विपक्ष के आंदोलनों का व्यापक राजनीतिक असर क्यों नहीं दिखाई दिया? क्या देश की सियासत सोशल मीडिया से तय होगी? क्या देश विपक्षहीन होने की ओर बढ़ रहा है? क्या यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की सेहत के लिए ठीक है? दूसरी ओर, छात्रों और बेरोजगारों के आंदोलनों ने सरकारों के सामने युवाओं की नाराजगी का सवाल जरूर खड़ा किया है।
गठबंधन का गठन और जमीनी हकीकत
तीन साल पहले, 18 जुलाई 2023 को बेंगलुरु में विपक्षी दलों के नेताओं ने इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्ल्यूसिव एलायंस यानी ‘इंडिया’ (गठबंधन) की घोषणा की थी। इस बैठक में 26 विपक्षी दल शामिल हुए थे। गठबंधन का उद्देश्य 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के मुकाबले विपक्षी एकजुटता कायम करना था।
इस गठबंधन में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, डीएमके के एमके स्टालिन, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार, शिवसेना (उद्धव गुट) के उद्धव ठाकरे, झारखंड मुक्ति मोर्चा के हेमंत सोरेन, जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला, पीडीपी की महबूबा मुफ्ती और वाम दलों के कई नेता शामिल थे। तय किया गया था कि गठबंधन के घटक दल आगे मिलकर चुनाव लड़ने की रणनीति बनाएंगे। लेकिन चुनावी राजनीति में सीटों के बंटवारे पर गैर-भाजपा दलों के बीच मतैक्य कायम करना लगातार चुनौती बना रहा। इसका लाभ भाजपा को मिलता रहा है। यह पहली बार नहीं है। डेढ़ दशक पहले तक कांग्रेस भी कई राज्यों में इसी तरह की चुनावी परिस्थितियों का लाभ उठाती रही थी।
इंडि गठबंधन के गठन के कुछ ही माह बाद चुनाव आयोग ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों की घोषणा की। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकारें थीं, जबकि मध्य प्रदेश में 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस विधायकों के भाजपा में जाने के बाद कांग्रेस सरकार गिर गई थी और भाजपा सत्ता में आ गई थी। लेकिन इन तीनों राज्यों में इंडि गठबंधन के घटक दलों के बीच चुनावी तालमेल नहीं बन पाया। तीनों राज्यों में भाजपा ने अपने दम पर चुनाव लड़ा और सरकार बनाने में सफलता हासिल की।
राजस्थान में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच मतभेद, छत्तीसगढ़ में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और टी.एस. सिंहदेव के बीच खींचतान तथा मध्य प्रदेश में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच संगठनात्मक और राजनीतिक मतभेदों को कांग्रेस के प्रदर्शन के संदर्भ में चर्चा का विषय बनाया गया। कांग्रेस नेताओं का तर्क था कि विपक्षी गठबंधन मुख्यतः लोकसभा चुनाव के लिए है। संभव है कि मतदाताओं के एक हिस्से को यह रणनीति स्वीकार्य नहीं रही हो।
उधर, इंडि गठबंधन के गठन के पीछे नीतीश कुमार की राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत करने की महत्वाकांक्षा की भी चर्चा हुई। लेकिन घटक दलों की आंतरिक खींचतान के बीच वह गठबंधन में निर्णायक भूमिका हासिल नहीं कर सके और बाद में भाजपा के साथ मिलकर एनडीए के समर्थन से बिहार की सरकार चलाते रहे।
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 99 सीटें मिलीं और वह लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद पाने की स्थिति में पहुंची। इसके बाद हरियाणा, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव हुए। इनमें झारखंड ऐसा राज्य रहा, जहां गठबंधन के घटक दलों के बीच अपेक्षाकृत बेहतर समन्वय देखने को मिला और इंडि गठबंधन को 56 सीटें मिलीं। झामुमो की अगुवाई में सरकार भी बनी।
बंटते वोट, सिमटता दायरा
कई अन्य राज्यों में गठबंधन के घटक दलों के बीच चुनावी तालमेल नहीं बन पाया और विपक्षी एकजुटता का असर सीमित रहा। बाद के दिनों में दिल्ली, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में भी गठबंधन के दलों के बीच मतभेद और अलग-अलग राजनीतिक रणनीतियां सामने आती रहीं। पश्चिम बंगाल की स्थिति तो और भी जटिल हो गई है। तृणमूल कांग्रेस में दो गुटों के बीच विवाद के बाद चुनाव आयोग ने सितंबर 2026 में अंतरिम आदेश के तहत दोनों गुटों को पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया। आयोग ने दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए हैं।
नंदीग्राम और रेजीनगर में 6 अक्टूबर को होने वाले विधानसभा उपचुनाव इस राजनीतिक खींचतान का ताजा उदाहरण हैं। नंदीग्राम में तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने नामांकन वापस ले लिया। इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने का ऐलान किया। लेकिन इसके कुछ ही समय बाद 2007 के नंदीग्राम आंदोलन से जुड़े पुराने मामलों में मिलन प्रधान को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। उनके खिलाफ अन्य पुराने मामलों में भी कानूनी कार्रवाई की खबरें सामने आईं।
उधर, रेजीनगर में ममता बनर्जी के उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी ने पहले चुनाव से हटने की घोषणा की, लेकिन बाद में बातचीत के बाद चुनाव मैदान में बने रहने का फैसला किया। इन घटनाक्रमों के बीच दोनों सीटों पर विपक्षी एकजुटता का सवाल फिर सामने आ गया है। नंदीग्राम और रेजीनगर में अलग-अलग दलों और गुटों के उम्मीदवार मैदान में हैं। ऐसे में मुकाबला बहुकोणीय हो गया है। कहने का मतलब यह है कि विपक्षी एकजुटता का दावा जमीन पर कितना असरदार है, इसकी परीक्षा इन उपचुनावों में भी होगी।
विपक्ष के लिए दिल्ली अभी दूर
अगले साल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और गोवा में विधानसभा चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के दूसरी पंक्ति के नेताओं की एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी से तो यही लगता है कि विपक्ष के लिए दिल्ली अभी दूर है। सपने में सरकार और कल्पना का बालू बांटने से किसी दल का भला नहीं होने वाला। उधर, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) और मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी अलग राजनीतिक आधार के साथ मैदान में हैं। विपक्षी मतों के विभाजन का असर चुनावी नतीजों पर पड़ना स्वाभाविक है।
राजनीति में शुचिता का संकट
अब बात नेताओं के चरित्र और चेहरे की भी कर लेते हैं। राजनीति में अपराध, धनबल और बाहुबल की मौजूदगी से लोकतंत्र पर जनता का विश्वास प्रभावित होता है। चुनाव सुधार संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के 2024 के लोकसभा चुनाव संबंधी विश्लेषण के मुताबिक 543 नवनिर्वाचित सांसदों में से 251 यानी 46 प्रतिशत ने अपने चुनावी हलफनामों में आपराधिक मामले घोषित किए थे। इनमें 170 सांसदों ने गंभीर आपराधिक मामलों की जानकारी दी थी।
इन आंकड़ों से राजनीति के अपराधीकरण की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि चुनावी हलफनामे में किसी आपराधिक मामले का घोषित होना दोष सिद्ध होने के समान नहीं है। ऐसे मामलों में आरोप और न्यायिक दोषसिद्धि के बीच अंतर को समझना भी उतना ही जरूरी है। सत्तापक्ष हो या विपक्ष, देश में अब सिद्धांतों की राजनीति कमजोर पड़ती दिखाई देती है। सुविधाओं की सियासत का आरोप लगातार लगता रहा है। आम मतदाताओं को शायद ही मालूम हो कि पूर्व जनप्रतिनिधियों के लिए पेंशन की व्यवस्था किस तरह काम करती है।
लोकसभा अथवा राज्यसभा के सदस्य रह चुके व्यक्ति को संसद के पूर्व सदस्य के रूप में पेंशन मिलती है। राज्यों में विधायकों और विधान परिषद सदस्यों की पेंशन के नियम अलग-अलग हैं। ऐसे में सवाल केवल पेंशन की राशि का नहीं, बल्कि इस बात का भी है कि जनप्रतिनिधियों के लिए तय इन सुविधाओं और आम नागरिक की आर्थिक स्थिति के बीच कितना अंतर है। कहने का तात्पर्य यह है कि देश के राजनेता चुनाव भले ही अलग-अलग दल और चुनाव चिह्न पर लड़ते हों, लेकिन सुविधाओं के सवाल पर कई बार उनके हित एक जैसे दिखाई देते हैं।
व्यवस्था के अंतर्विरोध और युवाओं का असंतोष
यह उस देश की हालत है, जहां करोड़ों लोगों को खाद्य सुरक्षा के दायरे में रखा गया है। दूसरी ओर, परीक्षा के पर्चे लीक हो जाते हैं और बेरोजगार हाथ मलते रह जाते हैं। पिछले दिनों छात्रों और बेरोजगारों के आंदोलनों ने सरकारों के सामने युवाओं की नाराजगी का सवाल खड़ा किया है। इसे इस तरह समझिए कि लगातार निराशाओं और समस्याओं से गुजरने के कारण नौजवानों का भरोसा राजनेताओं से हटता जा रहा है।
सरकार अपनी गति से चल रही है और विपक्ष चुनावी राजनीति में मशगूल है। किसान परेशान हैं। शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार और पलायन जैसे सवाल अब भी गंभीर हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अगले छह महीने में एक लाख युवाओं को नियुक्ति पत्र देने की बात कही है और राज्य में 15 हजार से अधिक शिक्षक पदों पर भर्ती की प्रक्रिया भी शुरू हुई है। लेकिन इसी बीच लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों ने मेस में खराब और कथित एक्सपायर्ड भोजन को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। ऐसे विरोधाभास सरकारों और राजनेताओं को संभलने का संकेत देते हैं।
देश के नौजवान जागरूक हैं और युवाओं की ऊर्जा में बड़ी ताकत होती है। इस ऊर्जा और असंतोष का उपयोग देशहित में हो, यही लोकतंत्र के लिए श्रेयस्कर होगा।





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