कहीं इक्का, कहीं शून्य, कहीं तुरुप का ताव।
बात बेलगाम इस बार निकाय चुनाव में कहीं एक वोट ने लाज बचाई, कहीं शून्य ने उम्मीदवार को ही चौंका दिया; कहीं पर्ची ने फैसला किया, कहीं निर्दलीय पूरी बाजी उलट गए और कहीं ईवीएम ने नतीजे को कल पर टाल दिया।...

बात बेलगाम
इस बार निकाय चुनाव में कहीं एक वोट ने लाज बचाई, कहीं शून्य ने उम्मीदवार को ही चौंका दिया; कहीं पर्ची ने फैसला किया, कहीं निर्दलीय पूरी बाजी उलट गए और कहीं ईवीएम ने नतीजे को कल पर टाल दिया। राजस्थान नगर निकाय चुनाव 2026 के नतीजे ऐसे खुले जैसे किसी ने राजनीति की ताश की गड्डी जोर से फेंटकर मेज पर पटक दी हो। बड़े खिलाड़ी अपनी-अपनी जीत के भरोसे बैठे थे, लेकिन खुलते पत्तों ने कई जगह हिसाब-किताब ही बदल दिया। लोकतंत्र ने भी इस बार गंभीर चेहरा छोड़कर खूब मनोरंजन किया।
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एक वोट की लाज
परबतसर में भाजपा प्रत्याशी कैलाश चंद्र को सिर्फ एक वोट मिला। एक वोट! चुनावी मैदान में इससे छोटा समर्थन शायद ही कोई हो, लेकिन इस एक मत ने कम से कम इतना तो कर दिया कि नाम के आगे शून्य नहीं लगा। अब वह एक वोट किसका था, यह रहस्य बना हुआ है। लेकिन उस अकेले मतदाता ने उम्मीदवार की चुनावी इज्जत बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लोकतंत्र में कभी-कभी एक वोट भी पूरी कहानी का नायक बन जाता है।
उम्मीदवार मैदान में, वोट दूसरे वार्ड में
सिणधरी में आरएलपी प्रत्याशी ओमप्रकाश को शून्य वोट मिले। वे दूसरे वार्ड के निवासी थे, इसलिए खुद को वोट देने का अधिकार भी नहीं था। यह चुनावी किस्मत का ऐसा मजाक है जिसमें उम्मीदवार तो मैदान में मौजूद है, लेकिन उसका अपना वोट कहीं और बैठा है। समर्थकों ने वोट दिया या नहीं, इस पर विवाद अपनी जगह, मगर आंकड़े ने जो तस्वीर दिखाई वह इतनी विचित्र है कि व्यंग्यकार को ज्यादा मेहनत की जरूरत ही नहीं पड़ती। उम्मीदवार शून्य पर और चुनावी गणित पूर्ण!
सैकड़ों वोट, फैसला एक पर्ची का
जहां मुकाबला बराबरी पर अटक गया, वहां घंटों की मतगणना के बाद फैसला एक छोटी-सी पर्ची से हुआ। उम्मीदवारों ने वोट गिने, समर्थकों ने सांसें गिनीं और आखिर में किस्मत ने अपनी पर्ची निकाल दी। सोचिए, जीत-हार के लिए सैकड़ों वोट पड़े और आखिरी फैसला उस कागज के टुकड़े ने किया, जिसकी अपनी कोई चुनावी रैली भी नहीं हुई थी!
घर-घर में चुनावी मुकाबला
इस बार रिश्तेदारी भी चुनावी मैदान में खूब उतरी। कहीं चाचा-भतीजा आमने-सामने थे, कहीं पति-पत्नी दोनों जीते और कहीं देवर-भाभी ने जीत का स्वाद चखा। राजनीति ने परिवारों को भी समझा दिया कि लोकतंत्र में रिश्ते अलग और वोट अलग होते हैं। एक ही घर में दो प्रत्याशी हों तो खाने की मेज पर भी शायद परिणाम आने तक चुनाव आयोग जैसा माहौल रहा हो! और जहां रिश्तेदारी काम नहीं आई, वहां मतदाता ने साफ कर दिया। परिवार अपनी जगह, मेरी उंगली अपनी जगह।
निर्दलीयों ने बिगाड़ा हिसाब
भरतपुर नगर निगम में 65 वार्डों में 36 निर्दलीय जीत गए। भाजपा को 20 और कांग्रेस को सात सीटें मिलीं। यानी दोनों प्रमुख दल अपनी-अपनी रणनीति, टिकट और संगठन लेकर मैदान में आए, लेकिन निर्दलीयों ने परिणाम की पूरी तस्वीर बदल दी। कल तक जिन उम्मीदवारों को पार्टी का टिकट न मिलने पर ‘बागी’ कहा जा रहा था, आज वही बहुमत के खेल में सबसे महत्वपूर्ण हो गए। राजनीति का यह भी कमाल है। जिसे कल दरवाजे पर खड़ा किया, आज उसी से चाबी मांगनी पड़ सकती है।
पार्षद या वीआईपी पैकेज?
अलवर और पाली में क्रॉस वोटिंग के डर से संभावित पार्षदों की बाड़ाबंदी ने चुनाव को और दिलचस्प बना दिया। लग्जरी बसों और सुरक्षित ठिकानों से मतदान केंद्र तक लाया गया और वोट डालते ही फिर रवाना। मानो पार्षद नहीं, कोई ऐसा वीआईपी पैकेज हो जिसकी डिलीवरी रास्ते में किसी दूसरे खिलाड़ी के हाथ न लग जाए। लोकतंत्र में जनता ने प्रतिनिधि चुने और पार्टियां उन्हें संभालने में ऐसी जुटीं कि मतदान केंद्र तक पहुंचने का सफर भी गोपनीय मिशन बन गया।
ईवीएम का अपना मूड
कोटा के वार्ड 87 में ईवीएम की तकनीकी समस्या से परिणाम रुक गया। जयपुर के कुछ बूथों पर भी डेटा उपलब्ध न होने से नतीजे होल्ड करने पड़े। उम्मीदवार बाहर इंतजार करते रहे, कार्यकर्ता बेचैन रहे और आधी रात तक धरना चलता रहा। मशीन शायद कह रही थी। वोट तो आपने डाल दिया, परिणाम की जल्दी आपको है; मुझे नहीं! डिजिटल युग में चुनाव तेजी से हुआ, लेकिन नतीजे को कभी मशीन ने रोका, कभी पर्ची ने और कभी राजनीति ने।
आखिरी बाजी जनता की
नगर निकाय चुनावों की यह ताश कई सबक छोड़ गई। एक वोट ने प्रतिष्ठा बचाई, शून्य ने उम्मीदवार को आईना दिखाया, पर्ची ने बराबरी का फैसला किया, रिश्तों ने राजनीति में पारिवारिक रंग भरा, निर्दलीयों ने दलों का गणित बिगाड़ा और ईवीएम ने इंतजार का धैर्य परखा। बड़े खिलाड़ी चाहे जितनी रणनीति बना लें, चुनावी मेज पर आखिरी चाल मतदाता ही चलता है।






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